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Vatayan - by Shiwani

 



(19 of 2021)

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"वातायन" शिवानी द्वारा (लेख एवं संस्मरण)

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अर्थ जानने हित 'वातायन' को अगर अंग्रेजी में अनुदित किआ जाये तो इसे वेंटिलेशन (ventilation) कहेंगे। राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित वातायन लखनऊ के दैनिक समाचारपत्र "स्वतंत्र भारत" में शिवानी द्वारा लिखे 28 निबंधों का संग्रह है। अंत में बोनस रूप में 'हे धूर्जटेः पशुपते!' नाम से नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का एक यात्रा वृत्तांत भी मिलेगा।

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यह संग्रह पढ़ने के बाद एक बात स्पष्ट हो जाती है - शिवानी जी जितना कौशल कथा/उपन्यास विधा में रखती हैं, उतनी ही रोज़मर्रा के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर उनकी सोच पैनी और सटीक है। भारत के दक्षिणी शहर बंगलुरु की खूबसूरती को जहाँ शिवानी बड़े प्रेम से बयां करती हैं, वहीँ लुप्त होते बाज़ीगरी, नट, सपेरों और कठपुतली के खेलों के प्रति उनका मोह हमें भी उदास कर जाता है। देश में बढ़ती अराजकता, कानून व्यवस्था से असंतोष, सेवानिवृत्ति पश्चात् आला अफसरों का लालफ़ीताशाही और भ्रष्टाचार से सामना - कुछ ऐसे मुद्दे भी छेड़े गए हैं जो आधी सदी बाद भी उतने ही वैध और प्रासंगिक लगते हैं, जितने लेखनी के समय रहे होंगे। बेगम अख्तर के साक्षात्कार पर आधारित उनका संस्मरण ह्रदय को छू जाता है। 

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किताब का मेरा मनपसंद लेख भारतवर्ष के त्योहारों के बारे मैं है। अपने बचपन में मेलों के लिए मिले जेबखर्च को शिवानी और उनके भाई (उन्ही के शब्दों में) उसी सतर्कता से बरतते हैं, जो सतर्कता केन्दीय बजट के निर्माण में प्रयुक्त होती है। इसे लेखनी की प्रतिभा ही कहेंगे, की मेरी माँ के समय का यह संस्मरण मुझे भी उसे समय में ले गया। कई बार पढ़ने के बाद जब मैंने फ़ोन पर यह लेख माँ को रिकॉर्ड कर भेजा तो भूतकाल की सुखद निश्छल स्मृतियाँ उन्हें भी प्रफुल्लित कर गईं। सच है, अच्छी कहानियां आपको एक जीवन में कई जीवनों के अनुभव दे जाती हैं। 

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वे पाठक जो नए हैं और लम्बी कहानियों के लिए ज़्यादा समय नहीं निकाल पाते, उनके लिए यह किताब उपयुक्त है। 

इस लेख संग्रह को मैं दूंगी 3.5/5 

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आजकल आप क्या पढ़ रहे हैं - बताइयेगा ज़रूर।


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